चंडीगढ़ न्यूज डेस्क: चंडीगढ़ मेयर पद के लिए हाथ उठाकर चुनाव कराने के फैसले के बाद नगर निगम की राजनीति में हलचल तेज हो गई थी। इसी बीच बुधवार को आम आदमी पार्टी की पार्षद सुमन शर्मा और पूनम के भाजपा में शामिल होते ही राजनीतिक जोड़तोड़ की चर्चाओं को बल मिल गया। इसे सिर्फ दो पार्षदों का दल बदल नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें सदन की भूमिका से लेकर विकास और धार्मिक कार्यक्रम तक अहम कड़ियां बने।
पार्षद पूनम का नाम इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। फरवरी 2024 में वह पहले भी आप छोड़कर भाजपा गई थीं, लेकिन कुछ ही दिनों बाद गुमराह किए जाने का आरोप लगाते हुए वापस लौट आई थीं। अब करीब 308 दिन बाद उन्होंने दोबारा भाजपा का दामन थामा है। सियासी जानकारों का मानना है कि यह फैसला अचानक नहीं लिया गया, बल्कि सितंबर से ही इसकी जमीन तैयार की जा रही थी। खराब सड़कों को लेकर शहर में चल रहे विरोध के बीच पूनम के वार्ड में सड़क निर्माण शुरू होना और सदन में मेयर की खुलकर तारीफ करना इसी दिशा की ओर इशारा करता है।
सुमन शर्मा के मामले में उनके वार्ड में हुए छठ पूजा आयोजन को अहम मोड़ माना जा रहा है। जब इस आयोजन को लेकर सदन में सवाल उठे, तब मेयर ने इसे धार्मिक कार्यक्रम बताते हुए सुमन का समर्थन किया। इसके बाद आयोजन में नगर निगम कमिश्नर की मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी। अब इन सभी घटनाओं को सुमन की भाजपा में एंट्री से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे नगर निगम की राजनीति और ज्यादा जटिल हो गई है।
इस दल-बदल का असर मनोनीत पार्षद गीता चौहान की स्थिति पर भी पड़ता दिख रहा है। सुमन शर्मा और गीता चौहान के बीच पहले से चले आ रहे मतभेद अब पार्टी के भीतर कैसे सुलझेंगे, यह बड़ा सवाल है। वहीं, गृहमंत्री अमित शाह के पंचकूला दौरे के बीच इस घटनाक्रम को भाजपा की रणनीतिक ताकत के प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। मेयर पद की दावेदारी अब संख्या बल पर टिकी है, और इसी कारण भाजपा में कंवरजीत राणा की सक्रियता भी साफ नजर आ रही है।