चंडीगढ़ न्यूज डेस्क: चंडीगढ़ और उससे सटे पेरीफेरी क्षेत्रों में बढ़ते अवैध निर्माण और उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच ने स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होगा। ट्रिब्यूनल ने चंडीगढ़ प्रशासन और पंजाब सरकार को निर्देश दिया है कि वे इन क्षेत्रों में चल रही निर्माण गतिविधियों को लेकर अगली सुनवाई में विस्तृत रिपोर्ट पेश करें।
मामले की सुनवाई एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की पीठ ने की। पीठ ने कहा कि यदि जांच में यह साबित होता है कि निर्माण कार्य पर्यावरणीय मानकों के विपरीत हैं, तो संबंधित विभागों और अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। याचिका में वन क्षेत्र, जल स्रोतों, ग्रीन बेल्ट और इको-सेंसिटिव जोन पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों की ओर ध्यान दिलाया गया है।
यह याचिका काउंसिल ऑफ इंजीनियर्स समेत अन्य की ओर से दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि प्रशासनिक ढिलाई के चलते चंडीगढ़ और पंजाब के पेरीफेरी इलाकों में अनियोजित और अवैध निर्माण तेजी से बढ़ा है। सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ और पंजाब सरकार की ओर से पेश वकीलों ने जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा, जिसे ट्रिब्यूनल ने मंजूर कर लिया। अगली सुनवाई 9 अप्रैल 2026 को तय की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन निर्माण गतिविधियों पर रोक नहीं लगी, तो ग्रीन बेल्ट और सुखना झील जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को गंभीर नुकसान हो सकता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट भी सुखना झील के कैचमेंट एरिया में हो रहे कंक्रीट निर्माण पर चिंता जता चुका है। एनजीटी की सख्ती से उम्मीद जताई जा रही है कि पेरिफेरी क्षेत्रों में अवैध निर्माण पर प्रभावी नियंत्रण किया जाएगा।