चंडीगढ़ न्यूज डेस्क: चंडीगढ़ प्रशासन ने शहर की पुनर्वास कॉलोनियों में रहने वाले लोगों को मालिकाना हक देने के लंबे समय से लंबित मुद्दे की समीक्षा के लिए नई कमेटी गठित की है। एस्टेट विभाग के सचिव की अध्यक्षता में बनी यह कमेटी करीब 35,000 मकानों के भविष्य पर रिपोर्ट तैयार करेगी। यूटी के मुख्य सचिव एच. राजेश प्रसाद ने कानूनी पहलुओं की जांच और अन्य शहरों के मॉडल का अध्ययन कर जल्द रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं।
यह फैसला 2023 में गठित पिछली कमेटी की सिफारिशों को प्रशासन द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद लिया गया है। उन सिफारिशों को निवासियों के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला माना गया था। अधिकारियों के अनुसार, प्रशासन के पास सभी पुनर्वास कॉलोनियों का सर्वे डेटा उपलब्ध है, जिसमें सामने आया है कि करीब 80 प्रतिशत निवासी मूल आवंटी नहीं हैं और जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) के आधार पर रह रहे हैं। कई मकान तीन-चार बार तक बिक चुके हैं, जबकि प्रशासन का कहना है कि ऐसे लेन-देन कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं क्योंकि मकान मालिकाना हक के बजाय लाइसेंस आधार पर आवंटित किए गए थे।
यह मुद्दा संसद में भी उठ चुका है। सांसद मनीष तिवारी के प्रश्न के जवाब में केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया था कि ऐसे मामलों में मालिकाना हक देने का कोई प्रावधान नहीं है। ये मकान वर्ष 1979 के आसपास पुनर्वास योजना के तहत 99 साल की लीज पर आवंटित किए गए थे। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने केवल GPA के आधार पर संपत्ति हस्तांतरण पर रोक लगा दी थी, जो अब भी लागू है।
दड्डूमाजरा, इंदिरा कॉलोनी, मनीमाजरा, मौली जागरण, धनास, बापू धाम और सेक्टर 52 व 56 जैसी कॉलोनियों में लंबे समय से मालिकाना हक की मांग उठती रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1980 से अब तक आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 34,965 से अधिक मकान बनाए गए, जिनमें से 15,000 से ज्यादा इकाइयों पर लाइसेंस फीस बकाया है। पिछली कमेटी ने मालिकाना हक न देने और बकाया वसूली के साथ बाजार दर के अनुसार लाइसेंस फीस संशोधित करने की सिफारिश की थी। अब नई कमेटी सभी पहलुओं की दोबारा समीक्षा कर अंतिम निर्णय के लिए रिपोर्ट देगी।